योग की थिक?
ज्योतिष मे "योग" दू वा बेसी ग्रहक बीच बनए बला विशिष्ट संबंध वा संयोजन केँ कहल जाइत अछि। कुंडली मे ई संयोजन बनला पर विशेष शुभ वा चुनौतीपूर्ण फल भेटि सकैत अछि। किछु योग धन, अधिकार आ यश देनिहार मानल जाइत अछि (राज योग, धन योग आदि), जखन कि किछु योग ध्यान देबा योग्य चुनौती देखबैत अछि (केमद्रुम योग आदि)।
गजकेसरी योग
गुरु आ चन्द्रमाक परस्पर केंद्र मे रहला सँ बनय बला अति शुभ योग।
विस्तार सँ पढ़ू →राज योग
केंद्र (1,4,7,10) आ त्रिकोण (1,5,9) क स्वामीक संबंध सँ बनय बला योग।
विस्तार सँ पढ़ू →धन योग
धनेश-लाभेशक संबंध सँ बनय बला समृद्धिदायक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →बुधादित्य योग
सूर्य आ बुधक युति सँ बनय बला बुद्धि-प्रधान योग।
विस्तार सँ पढ़ू →पंच महापुरुष योग
मंगल, बुध, गुरु, शुक्र वा शनिक केंद्र मे स्वराशि/उच्च भेला सँ बनय बला पाँच महायोग।
विस्तार सँ पढ़ू →चंद्र-मंगल योग
चन्द्रमा आ मंगलक युति सँ बनय बला धन-अर्जन योग।
विस्तार सँ पढ़ू →विपरीत राज योग
दुःस्थान (6,8,12) क स्वामीक दुःस्थाने मे रहला सँ बनय बला विशेष योग।
विस्तार सँ पढ़ू →केमद्रुम योग
चन्द्रमाक दुनू दिस (2म-12म) ग्रह नहि रहला सँ बनय बला चुनौतीपूर्ण योग।
विस्तार सँ पढ़ू →रुचक योग
मंगलक केंद्र मे स्वराशि (मेष, वृश्चिक) वा उच्च राशि (मकर) मे भेला सँ बनय बला महापुरुष योग।
विस्तार सँ पढ़ू →भद्र योग
बुधक केंद्र मे स्वराशि (मिथुन, कन्या) वा उच्च राशि (कन्या) मे भेला सँ बनय बला महापुरुष योग।
विस्तार सँ पढ़ू →हंस योग
गुरुक केंद्र मे स्वराशि (धनु, मीन) वा उच्च राशि (कर्क) मे भेला सँ बनय बला महापुरुष योग।
विस्तार सँ पढ़ू →मालव्य योग
शुक्रक केंद्र मे स्वराशि (वृषभ, तुला) वा उच्च राशि (मीन) मे भेला सँ बनय बला महापुरुष योग।
विस्तार सँ पढ़ू →शश योग
शनिक केंद्र मे स्वराशि (मकर, कुंभ) वा उच्च राशि (तुला) मे भेला सँ बनय बला महापुरुष योग।
विस्तार सँ पढ़ू →सुनफा योग
चन्द्रमा सँ द्वितीय भाव मे ग्रह रहला सँ बनय बला स्व-अर्जित धनक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →अनफा योग
चन्द्रमा सँ द्वादश भाव मे ग्रह रहला सँ बनय बला सौम्यता आ सम्मानक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →दुरुधरा योग
चन्द्रमाक दुनू दिस ग्रह रहला सँ बनय बला ऐश्वर्य-योग — केमद्रुमक ठीक विपरीत।
विस्तार सँ पढ़ू →अधि योग
चन्द्रमा सँ 6, 7, 8म भाव मे शुभ ग्रह रहला सँ बनय बला नेतृत्व-योग।
विस्तार सँ पढ़ू →अमल योग
दशम भाव मे मात्र शुभ ग्रह रहला सँ बनय बला निष्कलंक प्रतिष्ठाक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →सरस्वती योग
बुध, गुरु आ शुक्रक केंद्र-त्रिकोण वा द्वितीय भाव मे बलवान भेला सँ बनय बला विद्या-योग।
विस्तार सँ पढ़ू →लक्ष्मी योग
बलवान भाग्येश आ लग्नेशक केंद्र-त्रिकोण संबंध सँ बनय बला समृद्धि-योग।
विस्तार सँ पढ़ू →नीच भंग राज योग
नीच राशिक ग्रहक नीचत्व भंग भऽ राज योग मे बदलि जायब।
विस्तार सँ पढ़ू →परिवर्तन योग
दू ग्रहक एक-दोसरक राशि मे बैसि गेला सँ बनय बला राशि-परिवर्तन योग।
विस्तार सँ पढ़ू →कहल योग
चतुर्थेश आ नवमेशक परस्पर केंद्र-संबंध सँ बनय बला साहस आ भूमि-सुखक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →पर्वत योग
लग्नेश-चतुर्थेशक केंद्र मे रहला आ दुःस्थानक रिक्त रहला सँ बनय बला प्रतिष्ठा-योग।
विस्तार सँ पढ़ू →वेसि योग
सूर्य सँ द्वितीय भाव मे ग्रह रहला सँ बनय बला सत्यनिष्ठाक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →वासि योग
सूर्य सँ द्वादश भाव मे ग्रह रहला सँ बनय बला स्मृति आ दानशीलताक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →शकट योग
चन्द्रमाक गुरु सँ 6, 8 वा 12म भाव मे रहला सँ बनय बला उतार-चढ़ावक योग।
विस्तार सँ पढ़ू →दरिद्र योग
लाभेशक दुःस्थान (6, 8, 12) मे चलि गेला सँ बनय बला धन-बाधक योग।
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