🌙 आजुक तिथि
तेसर तिथि। संपत्ति सँ जुड़ल कार्य लेल उत्तम। अक्षय तृतीया विशेष शुभ।
ℹ️ तिथिक गणना — 12 अंशक नियम
सूर्य आ चन्द्रमाक बीचक कोणीय अंतर ठीक 12 अंश बढ़बा मे जतेक समय लगैत अछि, सैह एक तिथि कहबैत अछि। अमावस्याक बाद चन्द्रमा सूर्य सँ दूर हटब शुरू करैत अछि आ प्रत्येक 12 अंश पूरा होइतहि एक तिथि समाप्त भ' जाइत अछि। पूरा 360 अंश पूरा भेला पर 30 तिथिक संग एक चान्द्र मास पूरा होइत अछि।
तिथिक लंबाई हरदम एक समान नहि रहैत अछि। चन्द्रमाक कक्षीय चालि घटैत-बढ़ैत रहबाक कारणेँ एक तिथि लगभग 19 सँ 26 घंटा धरि चलि सकैत अछि। एही कारणेँ कखनो एके तिथि दू अंग्रेजी तारीख पर पसरि जाइत अछि आ कखनो एके दिन मे दू तिथि बदलि जाइत अछि। जे तिथि सूर्योदयक समय चलैत रहैत अछि, ओही केँ ओहि दिनक तिथि लिखल जाइत अछि — एकरा उदया तिथि कहल जाइत अछि।
एतय मिथिलाक अपन एकटा खास बात अछि। मिथिला सहित उत्तर भारत मे मास पूर्णिमांत पद्धति सँ गनल जाइत अछि, अर्थात् मास पूर्णिमा केँ समाप्त होइत अछि आ कृष्ण पक्ष अगिला मासक नाम सँ पहिने अबैत अछि। दक्षिण आ पश्चिम भारत मे अमांत पद्धति चलैत अछि, जतय मास अमावस्या केँ समाप्त होइत अछि। परिणाम ई जे कृष्ण पक्षक एके तिथि मिथिला मे एक मास आ दक्षिण मे ओहि सँ पछिला मासक कहबैत अछि — जन्माष्टमी आ महाशिवरात्रिक मास-नाम मे एही अंतर देखाइत अछि। तिथि, वार आ नक्षत्र एके रहैत अछि; मात्र मासक नाम बदलैत अछि।
🗓️ पंद्रह तिथि आ मिथिलाक व्रत-पाबनि
नीचाँ देल तालिका मे प्रत्येक तिथिक संग ओ प्रमुख व्रत वा पाबनि देल गेल अछि जाहि सँ मिथिला मे ओ तिथि चिन्हल जाइत अछि। ई व्यावहारिक चिन्हारि पतरा पढ़ैत काल सभसँ बेसी काज अबैत अछि।
- प्रतिपदा — चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सँ विक्रम संवत्क नव वर्ष आ वासंतिक नवरात्र आरंभ; आश्विन शुक्ल प्रतिपदा केँ कलश स्थापना सँ दुर्गा पूजा शुरू।
- द्वितीया — कार्तिक शुक्ल द्वितीया भरदुतिया; नींव, अनुबंध आ लंबा यात्रा लेल अनुकूल।
- तृतीया — वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया, बिनु मुहूर्त देखने विवाहक अबूझ दिन; भाद्र शुक्ल तृतीया केँ हरितालिका तीज आ श्रावणक मधुश्रावणी एही तिथि पर पूर्ण होइत अछि।
- चतुर्थी — रिक्ता वर्ग; भाद्र शुक्ल चतुर्थी केँ चौरचन अर्थात् चौठचन्द्र आ गणेश चतुर्थी, कार्तिक शुक्ल चतुर्थी सँ छठिक नहाय-खाय।
- पंचमी — माघ शुक्ल पंचमी सरस्वती पूजा, विद्यारंभक दिन; मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी केँ जनकपुरक विवाह पंचमी; श्रावण कृष्ण पंचमी सँ मधुश्रावणी आ नाग पंचमी।
- षष्ठी — कार्तिक शुक्ल षष्ठी केँ छठि पाबनि, मिथिला आ बिहारक सभसँ पैघ व्रत; चैत्र मे सेहो चैती छठि।
- सप्तमी — माघ शुक्ल सप्तमी रथ सप्तमी; छठिक भोरका अर्घ्य सेहो सप्तमी केँ; वाहन कीनब आ सरकारी काज लेल उपयुक्त।
- अष्टमी — उग्र तिथि; भाद्र कृष्ण अष्टमी जन्माष्टमी, आश्विन कृष्ण अष्टमी केँ संतानक मंगल लेल जितिया अर्थात् जीवित्पुत्रिका व्रत, आश्विन शुक्ल अष्टमी दुर्गाष्टमी अर्थात् महाअष्टमी।
- नवमी — रिक्ता तिथि; चैत्र शुक्ल नवमी रामनवमी आ वैशाख शुक्ल नवमी जानकी नवमी — सीतामढ़ीक पुनौरा धाम मे विशेष — आश्विन शुक्ल नवमी महानवमी आ कुमारी पूजन।
- दशमी — आश्विन शुक्ल दशमी विजयादशमी, नव काज आरंभ करबाक अबूझ मुहूर्त; ज्येष्ठ शुक्ल दशमी गंगा दशहरा।
- एकादशी — उपवासक प्रमुख तिथि; ज्येष्ठ शुक्लक निर्जला एकादशी आ कार्तिक शुक्लक देवोत्थान एकादशी सभसँ प्रसिद्ध, जकर बाद विवाहक लगन खुजैत अछि।
- द्वादशी — एकादशी व्रतक पारण; दान आ अन्नदान लेल श्रेष्ठ।
- त्रयोदशी — प्रदोष व्रत; कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी धनतेरस, बासन आ धातु कीनबाक दिन।
- चतुर्दशी — रिक्ता तिथि; फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि, भाद्र शुक्ल चतुर्दशी अनंत चतुर्दशी, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी नरक चतुर्दशी।
- पूर्णिमा आ अमावस्या — आश्विन पूर्णिमा केँ कोजागरा, जखन नव वरक घर मखान आ पान बँटैत अछि; कार्तिक पूर्णिमा केँ सामा-चकेबाक विसर्जन आ गंगा स्नान; कार्तिक अमावस्या केँ दीयाबाती-सुखराती आ सोमवती अमावस्या पर स्नान-दान।
एही पंद्रह केँ पाँच वर्ग मे सेहो बाँटल जाइत अछि, जे प्रत्येक पाँच तिथि पर दोहराओल जाइत अछि — नंदा (1, 6, 11), भद्रा (2, 7, 12), जया (3, 8, 13), रिक्ता (4, 9, 14) आ पूर्णा (5, 10, 15)। रिक्ता मे नव आरंभ टारल जाइत अछि, मुदा ऋण चुकाएब आ उपचार शुरू करब वर्जित नहि अछि।
🪔 तिथि वृद्धि, तिथि क्षय आ पतराक मतभेद
जँ कोनो तिथि दू सूर्योदय केँ छूबि लिअय तँ ओकरा वृद्धि तिथि आ जँ कोनो सूर्योदय केँ छूने बिना एके दिन मे आरंभ भ' क' समाप्त भ' जाय तँ क्षय तिथि कहल जाइत अछि। प्रत्येक वर्ष ई प्रश्न उठैत अछि जे जन्माष्टमी, जितिया वा शिवरात्रि कोन दिन मानल जाय — उत्तर एही स्थिति मे नुकायल अछि।
एतय सूक्ष्म नियम काज अबैत अछि। किछु व्रत उदयव्यापिनी होइत अछि, अर्थात् सूर्योदयक समय जे तिथि हो सैह मान्य; किछु प्रदोषव्यापिनी, अर्थात् साँझक समय जे तिथि हो सैह मान्य; आ किछु निशीथव्यापिनी, अर्थात् अधरतियाक तिथि मान्य। जन्माष्टमी निशीथव्यापिनी अछि, चौरचन आ प्रदोष व्रत प्रदोषव्यापिनी, जखन कि एकादशी उदयव्यापिनी। अलग-अलग पंचांग अलग नियम केँ प्राथमिकता दैत अछि, तेँ दरभंगाक कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक विश्वविद्यालय पंचांग, मिथिलाक आन पतरा आ काशी वा नेपालक पंचांग कखनो-कखनो एक दिन आगाँ-पाछाँ तिथि बतबैत अछि। ई गणनाक भूल नहि, नियम-चयनक अंतर थिक।
तीन वर्ष मे एक बेर आबयवला अधिक मास अर्थात् मलमास मे तिथि दोहराओल जाइत अछि; व्रत आ पाबनि निज मास मे मात्र कयल जाइत अछि, अधिक मास मात्र दान, जप आ तीर्थ लेल राखल जाइत अछि। एहि पृष्ठक गणना दृक् पद्धतिक निकट एकटा अनुमान थिक — विवाह, गृह प्रवेश आ श्राद्ध सन कार्य लेल अपन क्षेत्रक छपल पतरा सँ मिलान अवश्य क' लिअ।
🔗 तिथिक संग बाँकी चारि अंग
पंचांग शब्दक अर्थे अछि पाँच अंग — वार, तिथि, नक्षत्र, योग आ करण। एहि मे तिथि सूर्य आ चन्द्रमाक अंतर नपैत अछि, नक्षत्र मात्र चन्द्रमाक स्थिति, योग दुनूक भोगांशक जोड़, आ करण तिथिक आधा भाग।
दिनक शुभ-अशुभ समय निकालबा लेल मिथिलो मे चौघड़िया खूब प्रचलित अछि। दिन आ राति केँ आठ-आठ भाग मे बाँटि अमृत, शुभ, लाभ, चर, रोग, काल आ उद्वेग चौघड़िया निकालल जाइत अछि — ई तिथि सँ स्वतंत्र, वार पर आधारित व्यवस्था थिक। तेँ व्यवहार मे लोक तिथि सँ दिन चुनैत छथि आ चौघड़िया सँ ओहि दिनक घड़ी।
पूरा दिनक विवरण देखबा लेल आजुक पंचांग, घड़ी चुनबा लेल आजुक चौघड़िया आ चन्द्रमाक स्थिति लेल आजुक नक्षत्र पृष्ठ देखू।