📐 ई योग कोना बनैत अछि?
केंद्र भाव (1, 4, 7, 10) क स्वामी आ त्रिकोण भाव (1, 5, 9) क स्वामीक बीच संबंध बनला पर राज योग निर्मित होइत अछि। ई संबंध चारि प्रकारेँ बनि सकैत अछि — एकहि भाव मे युति, परस्पर दृष्टि, राशि-परिवर्तन, अथवा एकक दोसरक राशि मे स्थित होयब।
सभसँ बलवान राज योग नवमेश आ दशमेशक युति सँ बनैत अछि, जकरा धर्म-कर्माधिपति योग कहल गेल अछि। पंचमेश आ चतुर्थेशक संबंध सेहो उत्तम मानल जाइत अछि। किछु लग्न मे एकहि ग्रह केंद्र आ त्रिकोण दुनूक स्वामी बनि स्वयं योगकारक भ' जाइत छथि — जेना मकर तथा कुंभ लग्न लेल शुक्र।
जँ योगकारक ग्रह निर्बल होथि, 6, 8 वा 12म भाव मे खसि पड़थि, अस्त होथि अथवा पाप ग्रह सँ पीड़ित होथि तँ योग फल नहि दैत अछि। राज योगक अनुभव करबाक लेल लग्नेशक बलवान होयब अनिवार्य शर्त अछि।
✨ फल
सामान्य फल
अधिकार, उच्च पद आ सामाजिक मान्यता — ई सभ राज योगक मुख्य फल अछि। जन्मक समयक आर्थिक स्थिति सँ बहुत ऊपर उठि जायवला जीवन-गति एहि योगक सभसँ स्पष्ट संकेत अछि। नेतृत्वक पद हिनका लग स्वयं चलि क' अबैत अछि।
कार्यक्षेत्र
सरकारी सेवा, राजनीति, प्रशासन, पैघ संस्थाक वरिष्ठ पद आ अपन उद्यम — एहि सभ मे ई सफल होइत छथि। अधीनस्थ लोक केँ संग ल' क' चलबाक क्षमता हिनक सभसँ पैघ शक्ति अछि।
दशा आ समय
राज योग जन्मे सँ फल नहि दैत अछि। योगकारक ग्रहक महादशा वा अंतर्दशा अयला पर मात्र अचानक उन्नति देखाइत अछि। यैह कारण अछि जे एकहि कुंडलीवला व्यक्ति तीस वर्ष धरि साधारण जीवन जीलाक बाद अगिला दस वर्ष मे असाधारण ऊँचाइ पाबि लैत छथि।
सावधानी
पदक संग आबयवला अहंकार एहि योगक सभसँ पैघ हानि अछि। संगहि, राज योगक भरोसे परिश्रम छोड़ि देब योग केँ निष्फल क' दैत अछि — योग अवसर दैत अछि, परिश्रम ओकरा परिणाम मे बदलैत अछि।
उपाय
योगकारक ग्रह सँ संबंधित वारक व्रत, इष्ट देवताक नियमित उपासना, वरिष्ठ जनक सम्मान आ अधीनस्थक प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार एहि योग केँ स्थायी बनबैत अछि।
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