📐 ई योग कोना बनैत अछि?
पर्वत योग दू प्रकार सँ बनैत अछि। पहिल — लग्नेश आ चतुर्थेश दुनू केंद्र मे होथि आ शुभ ग्रह सँ युत वा दृष्ट होथि। दोसर — छठम आ आठम भाव खाली होअय, अथवा ओहि मे मात्र शुभ ग्रह स्थित होथि, आ लग्न मे शुभ ग्रह बैसल होथि।
नामक अर्थे थिक पर्वत — ऊँचाई आ स्थायित्व। दुःस्थान सभक खाली रहब एहि योगक विशेषता अछि, किएक तँ एहि सँ जीवन मे बाधाक मात्रा स्वाभाविक रूप सँ कम भऽ जाइत अछि।
जँ छठम वा आठम भाव मे पाप ग्रह बैसि जाथि, अथवा लग्नेश निर्बल होथि तँ योग भंग भऽ जाइत अछि। शुभ ग्रहक बलवान रहब एतहु अनिवार्य शर्त अछि।
✨ फल
सामान्य फल
पर्वत योग समाज मे ऊँच स्थान आ स्थायी प्रतिष्ठा दैत अछि। एहन जातकक बातक वजन होइत अछि आ हिनक नाम अपन क्षेत्र मे सम्मान सँ लेल जाइत अछि।
वैभव आ सुख
भवन, वाहन, सेवक आ सुख-साधनक प्राप्ति एहि योगक स्पष्ट फल अछि। जीवन मे अभावक दौर लम्बा नहि चलैत अछि आ आर्थिक स्थिति निरंतर सुधरैत जाइत अछि।
स्वभाव
दानशीलता, विनम्रता आ व्यवहार-कुशलता एहि योगक लक्षण अछि। ई लोक विवाद सँ दूर रहैत छथि आ अपन आचरणे सँ अपन स्थान बनबैत छथि।
कार्यक्षेत्र
शिक्षा, प्रशासन, सार्वजनिक जीवन, अचल संपत्ति, व्यापार आ सामाजिक-धार्मिक संस्थाक संचालन — एहि क्षेत्र सभ मे ई योग विशेष फलदायी अछि।
उपाय
लग्नेश आ चतुर्थेश सँ संबंधित दिनक व्रत, नियमित दान, माताक सेवा आ घरक गोसाउनिक सीरक स्वच्छता एहि योगक फल केँ स्थायी बनबैत अछि।
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