पंचांगक पाँच अंग — तिथि, वार, नक्षत्र, योग आ करण
‘पंचांग’ शब्द स्वयं ‘पंच’ (पाँच) आ ‘अंग’ सँ बनल अछि — अर्थात् पाँच अंग बला। ई पारंपरिक हिंदू कैलेंडर थिक जे प्रतिदिनक खगोलीय तत्वक ब्योरा दैत अछि; मिथिला मे एकरा ‘पतरा’ कहल जाइत अछि आ कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालयक विश्वविद्यालय पंचांग विशेष रूप सँ मान्य अछि। कोनो दिनक शुभ वा अशुभ होएब, पाबनि-तिहारक तिथि आ मुहूर्त — सभ किछु एही पाँच अंग सँ तय होइत अछि।
तिथि
तिथि चन्द्रमा आ सूर्यक बीचक कोणीय अंतर पर आधारित चंद्र-दिन थिक। एक चंद्र मास मे तीस तिथि होइत अछि — शुक्ल पक्ष (बढ़ैत चन्द्रमा) क पंद्रह आ कृष्ण पक्ष (घटैत चन्द्रमा) क पंद्रह। अमावस्या आ पूर्णिमा एकर दू छोर थिक। कतेको व्रत आ पाबनि — जेना जितिया, चौरचन आ कोजागरा — सोझे तिथि सँ जुड़ल होइत अछि।
वार
वार अर्थात् सप्ताहक दिन, आ प्रत्येक वारक एकटा स्वामी ग्रह छथि — रविवार सूर्य, सोमवार चंद्र, मंगलवार मंगल, बुधवार बुध, गुरुवार गुरु, शुक्रवार शुक्र आ शनिवार शनि। कोनो काजक लेल वारक चुनाव ओकर ग्रह-स्वभावक अनुसार कयल जाइत अछि।
नक्षत्र
दिनक दौरान चन्द्रमा जाहि नक्षत्र मे रहैत छथि, ओ ओहि दिनक नक्षत्र कहबैत अछि। नक्षत्र दिनक स्वभाव केँ बहुत हद धरि तय करैत अछि — किछु नक्षत्र यात्राक लेल, किछु विवाहक लेल आ किछु नव आरंभक लेल शुभ मानल जाइत अछि।
योग आ करण
योग सूर्य आ चंद्रक संयुक्त स्थिति सँ बनय बला सत्ताईस विभाजन मे सँ एक थिक, जाहि मे किछु शुभ आ किछु त्याज्य मानल जाइत अछि। करण तिथिक आधा भाग होइत अछि — एक तिथि मे दू करण। एहि दुनूक उपयोग सूक्ष्म मुहूर्त-निर्णय मे होइत अछि।
पंचांगक दैनिक उपयोग
एहि पाँच अंगक संग पंचांग राहुकाल, यमगंड, गुलिक काल आ अभिजित मुहूर्त सन शुभ-अशुभ समय सेहो बतबैत अछि। इएह कारण अछि जे कोनो शुभ काज आरंभ करबा सँ पहिने ओहि दिनक पंचांग देखल जाइत अछि।
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