📐 यह योग कैसे बनता है?
सूर्य से बारहवें भाव में चंद्रमा को छोड़कर कोई भी ग्रह स्थित हो, तब वासि योग बनता है। यह वेसि का पूरक योग है — वहाँ सूर्य के आगे ग्रह होता है, यहाँ सूर्य के पीछे।
यदि सूर्य के दोनों ओर — दूसरे और बारहवें, दोनों भावों में — ग्रह हों तो उभयचरी योग बनता है, जो इन तीनों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
वासि योग का फल भी उस ग्रह पर निर्भर करता है जो सूर्य से द्वादश में बैठा है। शुभ ग्रह से बना योग सम्मान और सामर्थ्य देता है; पाप ग्रह से बना योग परिश्रम और संघर्ष बढ़ा देता है।
✨ फल
सामान्य फल
वासि योग वाले जातक में स्मरण-शक्ति और वाक्-कुशलता अच्छी होती है। दूसरों को समझाने और अपनी बात मनवाने की क्षमता इनकी विशेषता है।
स्वभाव
दानशीलता और परोपकार इनके स्वभाव में है। पद और अधिकार मिलने पर भी विनम्रता बनी रहती है, जो इन्हें व्यापक स्वीकृति दिलाती है।
कार्यक्षेत्र
प्रशासन, शिक्षण, परामर्श, सार्वजनिक जीवन, चिकित्सा और सरकारी सेवा इस योग वाले जातकों के लिए अनुकूल हैं। साथ बैठे ग्रह के अनुसार क्षेत्र में विशेषज्ञता जुड़ जाती है।
सावधानियाँ
द्वादश भाव व्यय का है, इसलिए यह योग उदारता के साथ अनियंत्रित ख़र्च भी दे सकता है। साथ ही निर्णयों में अत्यधिक विचार-विमर्श से विलंब हो सकता है।
उपाय
रविवार को सूर्य-उपासना और अर्घ्य, ताँबे के पात्र का प्रयोग, गुड़-गेहूँ का दान तथा योग बनाने वाले ग्रह से संबंधित वार का व्रत इस योग को बल देते हैं।
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