📐 यह योग कैसे बनता है?
चंद्रमा बृहस्पति से छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, तब शकट योग बनता है। कुछ आचार्य केवल 6-8 की स्थिति को ही शकट मानते हैं। नाम का अर्थ है गाड़ी का पहिया — जो कभी ऊपर जाता है, कभी नीचे।
यह योग जीवन में बार-बार उतार-चढ़ाव का संकेत देता है। स्थिति बनते ही बिगड़ने लगती है और बिगड़ते ही फिर सँभल जाती है — यही इसका मूल स्वभाव है।
इसके भंग के भी नियम हैं। यदि चंद्रमा लग्न से केंद्र में हो, बृहस्पति बलवान होकर केंद्र में हो, अथवा चंद्रमा उच्च या स्वराशि का हो तो शकट योग का दोष बहुत कम हो जाता है। कुंडली में कोई प्रबल राज योग हो तब भी इसका प्रभाव सीमित रह जाता है।
✨ फल
सामान्य फल
अभंग स्थिति में यह योग आर्थिक और मानसिक स्थिति में बार-बार परिवर्तन देता है। परिश्रम के अनुपात में फल कम मिलता है और सफलता स्थायी नहीं रह पाती।
जीवन पर प्रभाव
प्रारंभिक जीवन में संघर्ष अधिक रहता है। सहायता का वचन देकर पीछे हट जाने वाले लोग बार-बार मिलते हैं, जिससे आत्मनिर्भरता विकसित होती है।
सकारात्मक पक्ष
यह योग जातक को अत्यंत सहनशील और परिस्थिति के अनुकूल ढल जाने वाला बना देता है। जो व्यक्ति बार-बार गिरकर उठा हो, उसे हराना कठिन होता है — यही इस योग की छिपी हुई शक्ति है।
ध्यान रखने योग्य बात
शकट योग देखकर घबराना उचित नहीं। पहले भंग के नियम और कुंडली के अन्य योग देखने चाहिए। अधिकांश कुंडलियों में इसका प्रभाव सीमित ही मिलता है।
उपाय
सोमवार का व्रत और शिव-उपासना, गुरुवार को बृहस्पति के लिए पीले वस्त्र और चने की दाल का दान, तथा प्रत्येक कार्य में योजना और धैर्य रखना इस योग के दोष को शांत करते हैं।
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