📐 यह योग कैसे बनता है?
हंस योग पंच महापुरुष योगों में बृहस्पति से बनने वाला योग है। इसके लिए बृहस्पति का लग्न से केंद्र में होना और साथ ही धनु अथवा मीन — अपनी स्वराशि — में, या कर्क — अपनी उच्च राशि — में स्थित होना आवश्यक है।
कर्क राशि का केंद्रस्थ बृहस्पति इस योग का सर्वोत्तम रूप है। यदि बृहस्पति लग्न या पंचम-नवम से संबंध बना ले तो फल और भी उत्तम होता है। चंद्रमा से भी केंद्र बने तो गजकेसरी और हंस, दोनों योग एक साथ बनते हैं।
बृहस्पति का अस्त होना, मकर राशि की ओर नीचता, अथवा राहु से युति हंस योग को दुर्बल करती है। ऐसी स्थिति में ज्ञान तो मिलता है पर उसका सामाजिक सम्मान नहीं मिल पाता।
✨ फल
व्यक्तित्व
हंस योग वाले जातक के चेहरे पर एक विशेष शांति और गरिमा दिखाई देती है। इनके पास लोग सलाह लेने आते हैं और इनकी उपस्थिति मात्र से वातावरण संयत हो जाता है।
शिक्षा और कार्यक्षेत्र
उच्च शिक्षा, अध्यापन, विधि, न्यायपालिका, वित्तीय परामर्श, धर्म और दर्शन, प्रकाशन, चिकित्सा तथा परोपकारी संस्थाओं का संचालन — इन क्षेत्रों में यह योग असाधारण सफलता देता है।
चरित्र और प्रतिष्ठा
नैतिकता इस योग की मूल विशेषता है। अनुचित मार्ग से लाभ लेना इन्हें स्वीकार नहीं होता, और यही गुण इन्हें दीर्घकालिक प्रतिष्ठा दिलाता है। धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में इनकी सहभागिता स्वाभाविक रूप से बनी रहती है।
सावधानियाँ
उपदेश देने की प्रवृत्ति और स्वयं को नैतिक रूप से श्रेष्ठ मानने का भाव इस योग की सबसे बड़ी बाधा है। इसके अतिरिक्त वज़न-वृद्धि, यकृत और मधुमेह की ओर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
उपाय
गुरुवार का व्रत, विष्णु-सहस्रनाम का पाठ, पीले वस्त्र और चने की दाल का दान, गुरुजनों का सम्मान तथा विद्या-दान इस योग को और प्रबल करते हैं।
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