📐 यह योग कैसे बनता है?
लग्न से अथवा चंद्रमा से दशम भाव में केवल शुभ ग्रह — बुध, बृहस्पति या शुक्र — स्थित हो और वहाँ कोई पाप ग्रह न हो, तब अमल योग बनता है। "अमल" का अर्थ ही निर्मल अथवा निष्कलंक है।
चंद्रमा से दशम भाव में बना अमल योग सर्वाधिक प्रभावी माना जाता है। शुभ ग्रह का स्वराशि अथवा उच्च राशि में होना योग को और बलवान बनाता है।
यदि उस भाव पर किसी पाप ग्रह की दृष्टि पड़ जाए, अथवा शुभ ग्रह अस्त या नीच हो जाए तो योग भंग हो जाता है। दशम भाव कर्म और प्रतिष्ठा का है, इसलिए यहाँ की शुद्धता ही इस योग का आधार है।
✨ फल
सामान्य फल
अमल योग निष्कलंक प्रतिष्ठा देता है। ऐसे जातक का नाम विवादों से दूर रहता है और उनकी ईमानदारी ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी बनती है।
कर्म और चरित्र
अनुचित मार्ग से लाभ लेना इन्हें स्वीकार नहीं होता। यही कारण है कि इनकी उन्नति धीमी हो सकती है, पर पतन प्रायः नहीं होता। समाज इनकी बात पर विश्वास करता है।
कार्यक्षेत्र
लोक-सेवा, अध्यापन, न्याय, चिकित्सा, समाजसेवा, धार्मिक संस्थाएँ और परोपकारी संगठन — इन क्षेत्रों में यह योग विशेष रूप से फलदायी है।
दीर्घकालिक फल
अमल योग तत्काल धन नहीं देता, नाम देता है। और वह नाम आगे चलकर धन, अवसर और सहयोग तीनों खींच लाता है। जीवन के उत्तरार्ध में इसका फल सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।
उपाय
दशमस्थ शुभ ग्रह से संबंधित वार का व्रत और दान, नियमित सेवा-कार्य तथा दिए गए वचन का पालन — यही इस योग को जीवित रखने वाले सबसे प्रभावी उपाय हैं।
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